(जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ति, हो श्रीमंगल मूर्ति, दर्शनमात्रे मनन कामना पूर्ति जयदेव जयदेव) - २
सिंदूर लाल चढायो अपने ही मन का, सुन्दर लाल विराजे सूत गौरी शिव का |
हाथ में है गूढ़ लड्डू प्रभु गजानन के, महिमा कहू तो कैसे, झुकाऊ सिर पद में || (जयदेव जयदेव)
गणेशा तेरा रूप निराला कोटि सूर्य का है तुझमें उजाला | लंबोदर पीतांबर तेरा क्या कहना, सरल सुन्द वक्र तुन्दत्री नैना || (जयदेव जयदेव)
सिंदूर रंजित हर अंग सुन्दर मोतियों की माला चमके गले पर | सर्व गुण सपन्न ओ गौरी नंदन, तुझको भाये कुमकुम केसर चन्दन || (जयदेव जयदेव)
ग्यानी दानी तू है सिध्हिदाता, सबके लिए तेरा प्यार बरसता | तेरी लीला जग में है न्यारी, करता है तू मुसे की सवारी || (जयदेव जयदेव)
मन की आँखें ढूंढे है तुझको, दे दो अब तो दर्शन हमको | अपने सेवक के घर पे तू आना, संकट में हम सब की रक्षा तू करना || (जयदेव जयदेव)
सिंदूर लाल चढायो अपने ही मन का, सुन्दर लाल विराजे सूत गौरी शिव का | हाथ में है गूढ़ लड्डू प्रभु गजानन के, महिमा कहू तो कैसे, झुकाऊ सिर पद में || (जयदेव जयदेव)
जय जय श्री गजराज विद्या सुख दाता, हर विघ्न हरता | धन्य दर्शन तुम्हारा मेरा मन रमता || (जयदेव जयदेव)
(जयदेव जयदेव जय मंगल मूर्ति, हो श्रीमंगल मूर्ति, दर्शनमात्रे मनन कामना पूर्ति जयदेव जयदेव) - २
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